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Current affairs 2019In hindi

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Current Affairs,

GS Paper 1 Source: The Hindu

TOPIC : BHIMA KOREGAON ANNIVERSARY
संदर्भ

जनवरी 1, 2019 को भीमा कोरेगाँव लड़ाई की 201वीं वर्षगाँठ थी.

भीमा कोरेगाँव लड़ाई क्या थी?

जनवरी 1, 1818 को पेशवा और अंग्रेजों की सेना के बीच महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित भीमा कोरेगाँव में एक लड़ाई लड़ी गयी थी. ब्रिटिश सेना ने इस युद्ध में पेशवा के सेना को पराजित किया था.

लड़ाई के परिणाम

ब्रिटिश सेना में बहुत से सैनिक महार जाति के थे. दूसरी ओर, पेशवा की सेना में उच्च जाति के सैनिकों का बोलबाला था. इसलिए भीमा कोरेगाँव की जीत को कुछ लोगों ने माना कि यह दलितों की जीत है. ऐसे लोगों में अम्बेडकर भी शामिल थे. उन्होंने 1 जनवरी, 1927 को भीमा कोरेगाँव में अंग्रेजों द्वारा स्थापित स्मारक स्तम्भ की यात्रा की थी. उस स्तम्भ में ब्रिटिश सेना के मारे गये सैनिकों का नाम लिखा हुआ है. इसको देखने से पता चलता है कि इन मारे गये सैनिकों में लगभग दो दर्जन महार जाति के थे. विदित हो कि महार कथित रूप से अस्पृश्य जाति हैं. अम्बेडकर भी इसी जाति के थे.

वर्तमान परिप्रेक्ष्य

जाति और जाति संघर्ष आधुनिक भारत की ऐसी सच्चाई है जिससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता. संविधान ने जाति-व्यवस्था को नहीं माना है. आज जातिगत भेदभाव में पहले की तुलना में बहुत कमी आयी है, परन्तु अभी भी समाज इससे पूरी तरह से ऊपर उठ नहीं पाया है. हर जाति अपने को उच्च, वीर और सशक्त मानने के लिए उतावली है. भीमा कोरेगाँव की लड़ाई अंग्रेजों ने लड़ी थी और इस लड़ाई में अंग्रेजों के दुश्मन भारतीय ही थे, भले वे पेशवा, मराठा या कोई भी हों. इसलिए चाहिए यह था कि इस लड़ाई में भारतीयों की हार का शोक मनाया जाता, परन्तु इसमें भी कुछ लोगों ने अपनी जाति की संतुष्टि का साधन ढूँढ़ लिया और इसे दलित बहादुरी का एक प्रमाण मान लिया. यह स्थिति उपयुक्त नहीं है और समाज को बाँटने वाली अवधारणा है.

GS Paper 2 Source: The Hindu

TOPIC : INDIAN BRIDGE MANAGEMENT SYSTEM
संदर्भ

भारत सरकार के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने भारतीय सेतु प्रबंधन प्रणाली (Indian Bridge Management System – IBMS) के अंतर्गत पूरे देश में जितने पुल या पुलियाँ हैं, उनकी एक सूची तैयार की है.

इस सूची के अनुसार देश में 1,835 बहुत लम्बे पुल, 3,647 बड़े पुल, 32,806 छोटे पुल तथा 1,34,229 पुलियाँ हैं.

IBMS क्या है?

भारतीय सेतु प्रबंधन प्रणाली (IBMS) देश के सभी पुलों की सूची तैयार करती है और उनकी वर्तमान दशा से सम्बंधित सूचना प्रदान करती है जिससे कि उनके ढाँचे की दशा को देखते हुए समय पर उनकी मरम्मत का काम हो सके.
IBMS विश्व का ऐसा सबसे बड़ा मंच है जिसका स्वामित्व एक ही जगह है.
पुल/पुलियाँ की सूची क्यों चाहिए?

देश के पुलों और पुलियों के बारे में डाटाबेस नहीं रहने के कारण यह स्पष्ट रूप से पता नहीं रहता कि इनकी संख्या क्या है और ये कहाँ पर स्थित हैं. इसलिए, इनका संधारण करना कठिन हो जाता है. यदि कोई पुल अच्छी दशा में नहीं है तो कुशल यातायात पर इसका दुष्प्रभाव तो पड़ता ही है, बहुधा दुर्घटना भी घट जाती है जिसमें लोग हताहत होते हैं. अतः इनके बारे में डाटाबेस की आवश्यकता है.

यह सूची कैसे बनती है?

सूची बनाते समय हर पुल को एक अनूठी पहचान संस्था अथवा राष्ट्रीय पहचान संख्या दी जाती है जो राज्य, क्षेत्रीय यातायात कार्यालय (RTO) जोन पर आधारित होती ही है, साथ ही इसमें यह संकेत भी होता है कि अमुक पुल किसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर है अथवा राज्य राजमार्ग पर है या किसी जिला-सड़क पर है.
फिर उस पुल को एक पुल लोकेशन नंबर दिया जाता है जिसमें GPS के माध्यम से आक्षांश-देशांतर का पता लगाकर स्थिति स्पष्ट की जाती है.
तत्पश्चात् पुल की अभियांत्रिक विशेषताओं का उल्लेख करते हुए पुल वर्गीकरण नंबर दिया जाता है. ये विशेषताएँ हैं – रूपांकन, प्रयुक्त सामग्री, पुल का प्रकार, पुल की आयु, उस पर जाने वाली लदान, ट्रैफिक लेन, लम्बाई आदि.
इसके बाद पुल की ढाँचागत रेटिंग दी जाती है. यह रेटिंग 0 से 9 के पैमाने पर आँकी जाती है.
इसके अतिरिक्त हर पुल को एक सामाजिक-आर्थिक पुल रेटिंग नंबर भी दिया जाता है जिसमें उसके सामाजिक-आर्थिक योगदान का उल्लेख होता है.

GS Paper 2 Source: Times of India

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TOPIC : SAUBHAGYA SCHEME
संदर्भ

महाराष्ट्र ने केन्द्रीय योजना “सौभाग्य” के तहत 100% विद्युतीकरण का लक्ष्य पूरा कर लिया है जिसके फलस्वरूप 10,93,614 घरों में बिजली निर्धारित समय सीमा दिसम्बर 31के पहले (दिसम्बर 27 को) पहुँच गई है.

सौभाग्य योजना क्या है?

SAUBHAGYAका full form है – (प्रधानमन्त्री) सहज बिजली हर घर योजना.
इस योजना का उद्घाटन सितम्बर, 2017 में हुआ था.
इस योजना के अंदर ग्रामीण क्षेत्रों के हर घर (APL और BPL दोनों) तथा शहरी क्षेत्रों के गरीब परिवारों को निःशुल्क बिजली कनेक्शन दिया जाता है.
सौभाग्य योजना के संचालन के लिए ग्रामीण विद्युतीकरण निगम (Rural Electrification Corporation – REC) को सूत्रधार एजेंसी (nodal agency) बनाया गया है.
इस योजना का उद्देश्य देश के हर घर में बिजली पहुँचाना है.
इस योजना पर कुल मिलाकर 16,320 करोड़ का खर्च आएगा.
इस योजना में सरकारी कुल खर्च = 16, 320 करोड़ रू. – – – सरकारी बजटीय सहायता = 12, 320 करोड़ रू.
ग्रामीण आवास व्यय = 14025 करोड़ रु. – – – सरकारी बजटीय सहायता = 10, 587.50 करोड़ रु.
शहरी आवास व्यय = 50 करोड़ रु. – – – सरकारी बजटीय सहायता = 2295 करोड़ रु.
इस योजना के लिए सभी DISCOMs को अर्थात् बिजली वितरक कंपनियों, राज्य ऊर्जा विभागों एवं ग्रामीण विद्युतीकरण सहकारी सोसाइटियों को सहायता दी जायेगी.
बिजली के निःशुल्क कनेक्शन को चाहने वाले लोगों की पहचान उनके सामाजिक आर्थिक जनगणना (Socio-Economic census) 2011 को आधार बनाकर की जायेगी. वैसे जो योग्य लोग 2011 की जनगणना में शामिल नहीं हैं, वे 500 रू. का भुगतान करके शामिल हो सकते हैं. इस राशि को बिजली वितरण कम्पनियों द्वारा उनसे 10 किश्तों में वसूला जायेगा.
भारत में जो दुर्गम क्षेत्र हैं यानी जहाँ बिजली तो दूर, आना-जाना मुश्किल है …वहां सरकार हर परिवार को Battery Bank यानी 200 से 300 WP का Solar Power Pack पहुँचाएगी. निम्नलिखित चीजें इन क्षेत्रों में पहुँचाई जायेंगी –

5 LED Lights
एक DC Fan
एक DC Power Plug
5 वर्ष के लिए free repair service
GS Paper 3 Source: The Hindu

TOPIC : KASTURIRANGAN REPORT ON WESTERN GHATS
संदर्भ

राज्य सभा की सरकारी आश्वासन समिति (The Committee on Government Assurances) ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से आग्रह किया था कि वह पश्चिमी घाट के स्थानीय लोगों की समस्याओं और दुखड़ों का समाधान करने के लिए एक समिति का गठन करे. उस समिति ने हाल ही में अपना प्रतिवेदन जमा कर दिया है.

समिति की महत्त्वपूर्ण टीकाएँ

सम्बंधित राज्य सरकारों की असंवेदनशीलता के कारण पश्चिमी घाटों के 56,000 वर्ग किलोमीटर से बड़े पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र को “No Go Zone” नहीं बनाया जा सका.
समिति का विचार है कि पश्चिमी घाट के राज्यों ने अपनी असंवेदनशीलता दिखला कर मूर्खता की है. हाल ही में केरल और कर्नाटक में मानसून की जो बाढ़ आई, उससे तो इन राज्यों की प्रशासन को चेत जाना चाहिए.
समिति का यह निष्कर्ष रहा कि कस्तूरीरंगन प्रतिवेदन में अंकित अनुशंसाओं को लागू करना तभी संभव होगा जब स्थानीय लोगों का इसमें सक्रिय सहयोग मिले. यदि पश्चिमी घाटों को बचाना है तो राज्य सरकारों से माइक्रो-स्तर पर परामर्श की अपेक्षा होगी.
पृष्ठभूमि

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा गठित उक्त समिति ने दो समितियों – माधव गाडगिल और के.कस्तूरीरंगन – की अनुशंसाओं के अनुसार पश्चिमी घाटों को पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने से सम्बंधित विषय की जाँच की थी. इस जाँच के क्रम में उसने 62 आश्वासनों पर विभिन्न राज्य सरकारों और अन्य संगठनों की चर्चा की थी और रिपोर्ट तैयार करने के पहले पुणे, मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु की यात्रा भी की थी.

गाडगिल समिति की अनुशंसाएँ

गाडगिल समिति ने पश्चिमी घाटों की परिभाषा दी और यह अनुशंसा की कि इस पूरे क्षेत्र को पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र (ecologically sensitive area – ESA) घोषित किया जाए. इस क्षेत्र के अन्दर भी तीन पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील जोन (ecologically sensitive zones – ESZ) I, II अथवा III बनाए जाएँ जो और यह वर्गीकरण वहाँ की वर्तमान दशा और खतरे की प्रकृति को देखते हुए किया जाए.
समिति का प्रस्ताव था कि पश्चिमी घाट को 2,200 ग्रिडों में बाँटा जाए, जिनमें 75% ESZ I अथवा II के अन्दर आएँ अथवा पहले से विद्यमान सुरक्षित क्षेत्रों, जैसे – वन्य-जीवन आश्रयणियों अथवा प्राकृतिक उद्यानों के अन्दर हों.
समिति ने पश्चिमी घाटों की गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए एक पश्चिमी घाट पर्यावरण प्राधिकरण (Western Ghats Ecology Authority) स्थापित करने का प्रस्ताव भी दिया था.
फिर कस्तूरीरंगन समिति की आवश्यकता क्यों?

गाडगिल समिति का रिपोर्ट अगस्त, 2011 में आया परन्तु उसे किसी भी पश्चिम घाट के राज्य ने स्वीकार नहीं किया. इसलिए अगस्त, 2012 में पर्यावरण मंत्रालय ने एक नई समिति बनाई जिसके अध्यक्ष कस्तूरीरंगन नियुक्त हुए थे. इस समिति को कहा गया कि वह गाडगिल समिति के रिपोर्ट का अध्ययन कर एक नए ढंग का रिपोर्ट दें जो सबके लिए मान्य हो.

कस्तूरीरंगन समिति की अनुशंसाएँ

पश्चिमी घाट में कोयले का नया बिजली घर नहीं बनाया जाए, अपितु पनबिजली की परियोजनाएँ लगाई जाएँ.
प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग यहाँ प्रतिबंधित हों.
20,000 वर्गमीटर तक के भवन और निर्माण परियोजनाओं को अनुमति मिले पर टाउनशिप पूरी तरह मना हो.
जंगल को हटाने की अनुमति मिले परन्तु बहुत अधिक सुरक्षात्मक निर्देशों के साथ.
इस समिति ने सुझाव दिया था कि खनन के जो काम चल रहे हैं, उनको धीरे-धीरे पाँच वर्षों में बंद कर देना चाहिए.
समिति की यह भी अनुशंसा थी कि यहाँ जो भी निर्माण कार्य हों, उनके लिए पर्यावरण विषयक अनुमति अनिवार्य होनी चाहिए.
समिति का यह भी कहना था कि भविष्य में यहाँ जो भी परियोजनाएँ लागू की जाएँ उनके बारे में निर्णय लेते समय क्षेत्र के गाँवों की राय भी ली जाए.

GS Paper 3 Source: PIB

TOPIC : ISRO LAUNCHES SAMWAD WITH STUDENTS ON NEW YEAR DAY
संदर्भ

हाल ही में बेंगलुरु में ISRO ने “छात्रों के साथ संवाद” / “Samwad with Students” – SwS नामक एक नए मंच का अनावरण किया है.

SwS

इस मंच का उद्देश्य देश-भर के छोटे-छोटे बच्चों में वैज्ञानिक सोच पैदा किया जा सके.
इस मंच से छात्र किसी भी विद्यालय और महाविद्यालय के छात्रों के साथ संवाद कर सकते हैं.
प्रयोग के तौर पर इस मंच का पहला आयोजन अन्तरिक्ष भवन में सम्पन्न हुआ जिसमें ISRO के अध्यक्ष डॉ.के. शिवन ने चुने हुए विद्यालयों के 40 छात्रों और 10 शिक्षकों से संवाद किया.

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